मराठी लोकांचे हिंदी....

Submitted by दक्षिणा on 20 November, 2009 - 03:06

जुन्या मायबोलीवर एक धमाल धागा होता, त्यातले काही अस्सल किस्से इथे संदर्भासाठी...
शिवाय त्याची ही लिंक
http://www.maayboli.com/hitguj/messages/644/85214.html?1223306531 -
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बाई : ए लिंबं कशी दिली रे?
भाजीवाला : बहनजी २ रुपैय्ये का ५
बाई : इतना महाग काय को देता हय? वो कोपरे का भैय्या देड मे ५ देता हय.
भाजीवाला : बहनजी वो खराब माल बेचता है.
बाई : हां मेरे को शेंडी मत लगाओ, पिछली बार यहां से लिया था तो उसमे से २ किडा हुआ निकला था.
भाजीवाला : आज का माल अच्छा है बहनजी, चलो २ रुपैये का ७ लेलो,
बाई : हां, बराबर मोजा क्या?
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आमचे काका केबल वाल्याला तक्रार करतात
हमारे टिव्ही मे मुंगी मुंगी दिखता है...
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आमच्या समोरच्या फ्लॅटमधली बाई एकदा दुधवाल्याला म्हणाली "भैय्या हमारा एक लिटर
दूध तुम्हारे अंगपर है..."
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घरमालक : सोनावनेजी आपका भाडा देनेका बाकी है.

सोनावने : अरे देता तो है ना, डुबवतंय काय? तुम्हारा डुबवके हमको क्या चैन मिलने वाला
हय? पण जरा तुम हमारी परिस्थिती हाय का नाय काय बघतंय का नाय? का नुसता उठसूठ
भाडा मागताय? हमारी परिस्थिती भी जरा बघो ना.......

घरमालक : लेकिन वो पिछले महिने का भी......

सोनावणे : अरे बाबा पिछले महिने हम वो पोळा सण के लिए गाव कू गया था ना...

घरमालक : पोळा???

सोनावणे : तुमको पोळा नै मालूम? उस दिन नही क्या वो बैल के शिंग को रंग लगाते है,
बैला के पाठिपर झूल टाकता है... तुम्हारे गाव मे नही होता है क्या...?

घरमालक : नही. इस महिने का तो देना ही पडेगा..

सोनावणे : ऐसा क्या? तो जरा अंदर आवो घर के. ये तुमने हमारे घर मे बांबु लगाया, कितना
बांबु लगाया, हमारा घर केवडा और तुम्हारा बांबु केवढा, अब हमारे घर में जब पावना लोग आता
है तो झोपनेकू जगा नही मिलती.. जगा नही मिलती तो कुछ पावना बांबु को टेकता है, वो बांबु को
टेकता है तो, उपर से माती गिरता है, हमारी मंडळी के कानानाकमें जाता है, वो तुम नीट करो पयले.

घरमालक: ???????
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अजून शोधून लिहिन.... तो पर्यंत तुमचे लिहा...

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हा हिंदी+ऐकण्यातला चुकीचा खरा किस्सा माझ्याच सोबत घडलेला
मी: "हॅलो, xxxx हॉल? हमारा सोसायटी कंपाउंड आपके हॉल के स्टेज के पिछे है, अभि अभि आपके हॉल स्टेजपर एक 4 फूट का गोल्डन यलो कलर का साप गया है.आप ध्यान रखना, वहा स्टेज पर आपके वर्कर आते है."
पलीकडे हॉल चा माणूस: "क्या? साब आपके यहा से निकला है क्या?अभितक नही पहुचा इधर.आया तो फोन करने बोलता हूँ."
आता 4 फुटाचा, गोल्डन यलो वगैरे वर्णनावरून माणूस नाहीय असा थोडा क्लू मिळायला हरकत नव्हती त्या बाबाजीला.

माझा भाऊ एकदा सातवी आठवीत असताना काश्मीरला गेला होता. तेव्हा तिथले ते पारंपारिक पोशाख भाड्याने देणारी लोकं या सगळयांच्या मागे लागली की, ये पेहेनके फोटो लेलो... वगैरे अर्थात पैसे होते त्यासाठी... हे सगळे नाही नाही म्हणत होते तरी ते मागे लागले म्हणून शेवटी माझा भाऊ वैतागून ओरडला "हमे नही घालनेका..."

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