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Submitted by स्वामी विश्वरूपानंद on 5 January, 2013 - 15:27

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-सचिन मधुकर परांजपे (पालघर) यांच्या पूर्वानुमतीने पुनरप्रकाशीत
मूळ लेख-https://www.facebook.com/astroguru.sachin

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Lol मस्त

नंतर नंतर शेवटाला जरा टीपिकल वाटले, प्रामाणिकपणे सांगतो हं..
पण आधीचे ऑब्जरवेशन मस्तच.. डोळ्यासमोर आले काका... Happy