रथामाजी जो चक्रधर | करी भ्रमणध्वणीचा स्विकार |
साक्षात यमाचा अवतार | तो एक मुर्ख ||
जो करीतो उत्तम व्यापार | परंतू चुकवितो कर |
सर्व जणासी भार | तो एक मुर्ख ||
जो सोडीतो यत्नाची कास | यश अपेक्षी विनासायास |
धाव घेई ज्योतीषास | तो एक मुर्ख ||
जो अपेक्षी शश्वूर धन | करी अर्थांगीसी मारहान |
नर जो असे बुध्धीविहीन | तो एक मुर्ख ||
धनाची धरून भ्रान्ता | धाडी माहेरासी कांता |
कारण सुलक्षीणीच्या अंता | तो एक मुर्ख ||
मार्गासी उभी करूनीया कार | उघडी विजारीचे दार |
निर्लज्ज जो सोडीतो धार | तो एक मुर्ख ||
जो जाये तिर्थाचिये वाट | खाय कोंबडीचे ताट |
वर मद्याचा घमघमाट | तो एक मुर्ख ||
दारासी उभा जो पुंड | सत्कार्यनामे करीसी दंड |
दुंर्बलासी जो भयगंड | तो एक मुर्ख ||
ठेउनी पु़त्राची अपेक्षा | करीसी गर्भपरीक्षा ||
कन्या रत्नासी मृत्यूशिक्षा | तो एक मुर्ख ||
जो लागला ताम्बूल भक्षणा | रंगविसी भिंत आणी जिणा ||
जन आरोग्याची नसे वंचणा | तो एक मुर्ख ||
जो करी धुम्रपानाचा थाट | लावी श्वसनमार्गाची वाट |
जवळ आणीसी शेवट | तो एक मुर्ख ||
वक्ता ऊभा पिंडदाना | करीता पक्षाचीये स्तवना |
करी मतांची वंचना | तो एक मुर्ख ||
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हरीश दांगट
मस्त!
मस्त!
हरीशजी, लई भारी ...कविता
हरीशजी,

लई भारी ...कविता आवडली !
मार्गासी उभी करूनीया कार | उघडी विजारीचे दार |

निर्लज्ज जो सोडीतो धार | तो एक मुर्ख ||
पुण्यासारख्या शहरात (शासन/मनपाच्या कृपादृष्टीमुळे) सोय नसल्यामुळे, अनेक ठिकाणी पंचाईत होते मग या वेळी दुसरा होणता उपाय शिल्लक राहतो ?
त्यामुळे असा मुर्खपणा भले भले करताना रोज दिसतात
मस्त आहे, आवडली
मस्त आहे, आवडली
"जो सोडीतो यत्नाची कास | यश
"जो सोडीतो यत्नाची कास | यश अपेक्षी विनासायास |
धाव घेई ज्योतीषास | तो एक मुर्ख ||"
....छान
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